**महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले (ज्योतिबा फुले)** भारत के महान समाज सुधारक, विचारक, लेखक, शिक्षाविद् और क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे। उन्हें “महात्मा फुले” और “जोतिबा फुले” के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, स्त्री-शिक्षा और किसानों-मजदूरों के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
ज्योतिबा फुले का जन्म **11 अप्रैल 1827** को महाराष्ट्र के सतारा जिले (या पुणे के आसपास) में एक माली (माली जाति, जो शूद्र वर्ग में मानी जाती थी) परिवार में हुआ था। उनके पिता गोविंदराव फुले फूलों और सब्जियों का व्यापार करते थे। माता चिमणाबाई का निधन तब हुआ जब ज्योतिबा बहुत छोटे थे।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण शुरुआती शिक्षा में बाधा आई, लेकिन एक पड़ोसी की सलाह पर उन्हें स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल, पुणे में दाखिला दिलाया गया। वहाँ उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पूरी की (लगभग 1847 तक)। शिक्षा ने उनके विचारों को गहराई दी। वे थॉमस पेन की पुस्तक *Rights of Man* से प्रभावित हुए, जिसने समानता और मानव अधिकारों के प्रति उनकी सोच को मजबूत किया।
### विवाह और सावित्रीबाई फुले के साथ साझेदारी
13 वर्ष की आयु में (लगभग 1840 में) उनका विवाह **सावित्रीबाई फुले** से हुआ, जो उस समय केवल 9 वर्ष की थीं। ज्योतिबा ने घर पर ही सावित्रीबाई को पढ़ाया-लिखाया। सावित्रीबाई बाद में भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। दोनों पति-पत्नी ने मिलकर स्त्री-शिक्षा और सामाजिक सुधार का काम किया।
1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में उन्होंने **लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल** खोला। सावित्रीबाई वहाँ शिक्षिका बनीं। रूढ़िवादी समाज ने उनका तीव्र विरोध किया—पत्थर और गोबर फेंके गए, सामाजिक बहिष्कार हुआ। फिर भी वे डटे रहे। उन्होंने कई स्कूल खोले, जिनमें अछूत बच्चों के लिए भी स्कूल शामिल थे। 1863 में उन्होंने विधवाओं और अविवाहित माताओं के लिए शरणस्थल (बालहत्या प्रतिबंधक गृह) भी शुरू किया।
### सामाजिक सुधार और सत्यशोधक समाज
ज्योतिबा फुले ने जाति-प्रथा को मानव-निर्मित व्यवस्था माना और ब्राह्मणवादी वर्चस्व की कड़ी आलोचना की। एक ब्राह्मण मित्र की शादी में अपमानित होने के बाद उनका जाति-विरोधी दृष्टिकोण और मजबूत हुआ।
**24 सितंबर 1873** को उन्होंने **सत्यशोधक समाज** (Truth Seekers’ Society) की स्थापना की। इसका उद्देश्य शूद्र-अतिशूद्र वर्ग को संगठित करना, जाति-भेद मिटाना, शिक्षा फैलाना और सत्य पर आधारित समाज बनाना था। सभी धर्मों और जातियों के लोग इसमें शामिल हो सकते थे। उन्होंने ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह संस्कार भी शुरू किए।
वे किसानों और मजदूरों के शोषण के खिलाफ भी लड़े। 1868 में उन्होंने अपना कुआँ अछूतों के लिए खोल दिया। पुणे म्यूनिसिपैलिटी के सदस्य भी रहे।
### प्रमुख रचनाएँ
ज्योतिबा फुले ने मराठी में लिखा ताकि आम लोग समझ सकें। प्रमुख पुस्तकें:
- **तृतीय रत्न** (1855) – नाटक, पुरोहितों द्वारा किसानों के शोषण पर।
- **ब्राह्मणांचे कसब** (1869) – ब्राह्मणवाद की आलोचना।
- **पोवाड़ा: छत्रपति शिवाजीराजे भोसले यांचा** (1869) – शिवाजी को शूद्र राजा के रूप में प्रस्तुत।
- **गुलामगिरी** (1873) – सबसे प्रसिद्ध कृति। जाति-प्रथा की तुलना अमेरिका की गुलामी से की और अमेरिकी गुलामी-विरोधी आंदोलन को समर्पित।
- **शेतकऱ्याचा आसूड** (किसान का चाबुक, 1881/1883) – किसानों के शोषण पर।
- **सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक** (मरणोपरांत)।
### मृत्यु और विरासत
1888 में उन्हें “महात्मा” की उपाधि दी गई (विठ्ठलराव कृष्णाजी वांदेकर द्वारा)। उसी वर्ष उन्हें लकवा हो गया। **28 नवंबर 1890** को पुणे में 63 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
उनका काम डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य समाज सुधारकों के लिए प्रेरणा बना। अंबेडकर उन्हें बुद्ध और कबीर के साथ अपना गुरु मानते थे। स्त्री-शिक्षा, जाति-विरोधी आंदोलन और सामाजिक न्याय की नींव रखने वाले अग्रणी सुधारक के रूप में वे आज भी याद किए जाते हैं। उनकी जयंती 11 अप्रैल को मनाई जाती है।
ज्योतिबा फुले का जीवन शिक्षा, समानता और न्याय के लिए समर्पित संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने साबित किया कि सामाजिक परिवर्तन शिक्षा और संगठित प्रयास से संभव है।

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